आज 21 जनवरी 2026 है, बुधवार का दिन। आगरा की ठंडी हवाएं ताजमहल के आसपास घूम रही हैं, लेकिन एक अमीर घराने में गर्मी का आलम है। वह घराना, जहां दौलत की चकाचौंध है, लेकिन दिलों में ठंडक नहीं।
एक अरबपति पिता अपने इकलौते बेटे प्रेम को नसीहत दे रहे थे: “बेटा, कितना भी कीमती हो, कितना भी खूबसूरत हो… बाजार का सामान घर सजाने के लिए होता है, बसाने के लिए नहीं। जवानी है, मौज करो, पैसा उड़ाओ, लेकिन घर लौट आओ। मैंने भी जवानी देखी है, इसलिए नहीं पूछता कि रात भर कहां घूमते हो। बस, बाजार को घर मत बना लेना। धर्म, समाज, जाति, खानदान की इज्जत का ख्याल रखना।”
लेकिन प्रेम का दिल एक नचनिया पर आ फंसा था। वह नचनिया, जिसका नाम था राधा। शहर के एक पुराने मुजरा घर में वह नाचती थी। उसकी अदाएं, उसकी लहराती जुल्फें, मस्ती भरी आंखें, गुलाब जैसे होंठ – सब कुछ जादू सा था। लोग पैसे लुटाते, सीटियां बजाते, लेकिन प्रेम का दिल उसमें डूब गया। वह जानता था कि राधा का पेशा है नाचना-गाना, लोग आते-जाते हैं, लेकिन वह लौटते हुए भी उसे मन में ले गया।
एक रात, महफिल के बाद प्रेम ने पूछा, “तुम्हारी कीमत क्या है?” राधा हंसकर बोली, “महफिल की रौनक हूं मैं। जिस्म खरीद सकते हो, रातें खरीद सकते हो। लेकिन मन? मन नहीं बिकता। जाओ, दीवाने, नशा उतरेगा तो खुद भूल जाओगे।”
पिता को पता चला तो गुस्सा आए, लेकिन उन्होंने सोचा – दौलत से सब हल होता है। दीवान को हुक्म दिया, “उसे खरीद लाओ, कुछ रातें। बेटे का नशा उतर जाएगा।”
फार्महाउस पर राधा आई। प्रेम के सामने। लेकिन प्रेम ने कहा, “तन नहीं, मन चाहिए मुझे। हमेशा के लिए। जाति, धर्म, दौलत – सब छोड़ने को तैयार हूं। भाग चलें, नई जिंदगी बसाएं।”
राधा रो पड़ी। “शहजादे, ये इश्क आसान नहीं। मेरी जाति, मेरा समुदाय, तुम्हारा खानदान – सब बर्बाद हो जाएगा। दौलत वाले हमें जीने नहीं देंगे।”
पिता ने राधा को अकेले बुलाया। धमकाया, “बेटे को भड़काओ मत। कीमत लो, शहर छोड़ दो। वरना तुम्हारा बाजार उजड़ जाएगा, घर बर्बाद।”
राधा उदास थी। वह प्रेम से सच्चा प्यार करती थी। सोचा, अगर मैं दूर हो जाऊं तो प्रेम बच जाएगा। लेकिन कैसे?
एक दिन राधा ने खुद फैसला लिया। वह प्रेम के पास गई और बोली, “तुम्हारी दीवानगी देखी नहीं जाती। मैं बाजारू हूं, दौलत की भूखी। तुम्हारे पिता ने मुझे ज्यादा पैसे ऑफर किए हैं। मैं उनके साथ जा रही हूं। भूल जाओ मुझे।”
प्रेम सदमे में आ गया। “झूठ है ये!” राधा ने आंसू छिपाते हुए कहा, “हकीकत है। मैंने चुन लिया दौलत को। तुम्हारे प्यार से बड़ा है पैसा।”
प्रेम टूट गया। वह चुप हो गया, गूंगा सा। लेकिन इस बार कहानी यहां नहीं रुकी।
कुछ महीने बाद, प्रेम ने खुद को संभाला। वह समझ गया कि राधा ने झूठ बोला था – उसे बचाने के लिए। उसने पिता से सामना किया। “पिताजी, आपकी दौलत ने सब कुछ बर्बाद करने की कोशिश की, लेकिन प्यार जीत गया।”
प्रेम ने गुप्त रूप से राधा से मिला। पता चला कि राधा ने पिता की धमकी से डरकर खुद को बदनाम किया था, ताकि प्रेम नफरत करे और आगे बढ़े। लेकिन प्रेम ने कहा, “अब भागेंगे नहीं। लड़ेंगे।”
प्रेम ने अपना हिस्सा दौलत छोड़ दिया। एक छोटा सा एनजीओ शुरू किया, जहां नाचने-गाने वालियों जैसे कलाकारों को सम्मान और नई जिंदगी दी जाती। राधा उसके साथ आई। उन्होंने शादी की – सादगी से, बिना खानदान के। समाज ने विरोध किया, लेकिन प्रेम की हिम्मत और राधा की हिम्मत ने सबको चुप करा दिया।
पिता अकेले रह गए। दौलत के महल में। एक दिन वे प्रेम के एनजीओ में आए। राधा को देखा, जो अब बच्चों को नृत्य सिखा रही थी। पिता के आंसू निकल आए। “माफ कर दो बेटा। मैं गलत था। बाजार से घर नहीं बसता, दिल से बसता है।”
प्रेम ने पिता को गले लगाया। परिवार फिर जुड़ गया – नई शुरुआत के साथ।
राधा और प्रेम की जोड़ी अब मिसाल बन गई। साबित कर दिया कि सच्चा प्यार दौलत, जाति और समाज से बड़ा होता है। घर बाजार से नहीं, दिल से बसता है।
नया संदेश: प्यार में हिम्मत हो तो हर बाधा पार की जा सकती है। पुरानी रूढ़ियां टूट सकती हैं, और नई जिंदगी शुरू हो सकती है।

